शनिवार, 22 जनवरी 2011

कभी कभी रो लेता हूँ.....

मेरे महताब की यादो में ,मै हर सितम सह लेता हूँ
तश्न-ए-दीदार को हर शब् में,मै इन्तजार कर लेता हूँ |
मेरे रूह को खुद मुझसे ही , उसने महरूम किया लेकिन-
मैकशी फासलों के दरमियाँ, कभी कभी रो लेता हूँ |

हासिल करने की चाहत में , ख्वाबों को संजो लेता हूँ ,
हिज्र को तकिये पे रख कर , कभी कभी सो लेता हूँ |
मेरे दिलशाद मिजाजों को , माना वो तोड़ गयी लेकिन -
दिलशिकन के रंजो गम में , कभी कभी रो लेता हूँ |