एक कविता थी मेरी - बड़ी ही प्यारी |
सुकून के सिलवटों में लिपटी हुई ,
सन्नाटों के शोर में सिमटी हुई ,
ख्वाबों के तकिये पर सर रखे -
स्वप्न के आगोश में उंघती हुई ,
एक कविता थी मेरी - बड़ी ही प्यारी |
वो अगर सब्ज़ होठों पर फिसल जाय,
तो गीत बन जाती थी ,
जो कभी फिजाओ में उड़ जाय तो
तो संगीत बन जाती थी,
आंसुओं से सनकर -
कपोलों को नम कर ,
गम के पैमाने से छलक जाये
तो मनमीत बन जाती थी ,
एक कविता थी मेरी - बड़ी ही प्यारी |
फूलों कि भी उम्र बीती
पंखुडियां झड़ने लगी ,
समय ने था करवट बदला
उम्र भी ढलने लगी ,
उसके सुर्ख चेहरे पर
गर्दिश-ऐ -धुंध छाने लगी ,
समय के ढलते चक्र में
मेरी कविता बूढी होने लगी ,
एक कविता थी मेरी - बड़ी ही प्यारी |
आखिर वो घड़ी आ ही गयी
जब कविता ने दम तोड़ दिया ,
सूनेपन के इस पथ में
मेरा संग छोड़ दिया ,
कविता का ये कवि -
बस जिन्दा ही मर गया,
शिथिल से इस शरीर में
बस और बस "मै" रह गया ,
एक कविता थी मेरी - बड़ी ही प्यारी |

Nice poems... detailed comments doonga...
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