शनिवार, 1 अगस्त 2009

मेरी शायरी !!!!!!!!!!!

कतरा- कतरा लहू मेरे अरमानों का -
वो पीकर, जिंदगी को नज़ीर दे गए ,
मै तो आह भरकर यूँ ही तड़पता रहा,
और वो मुद्दई, मुस्कराकर नासूर दे गए,
नासूर-ऐ-मौत पाकर भी, मेरे लरजते होठ -
उनके सलामत-ऐ-जिंदगी की दुआ दे गए



समुन्दर के आगोश में , तेज़ मंझधार में,
डूबते हुए नाव के सहारे बैठे हैं,
सुर्ख तन्हाई में, सूने मैखानेमें ,
बहते हुए अश्क के सहारे बैठे हैं ,
महफ़िल तो शमशान में फैली है चारो ओर-
हम तो कब्र में भी कफ़न के सहारे बैठे हैं,


तुम कहती हो तेरे जुल्फों तले सर रखकर सो जाऊं ,
पर कमबख्त तेरे केसुओं के जू मुझे सोने नही देते ,


मासूम मुस्कुराहटों पे जाँ निसार मत करना ,
दिल के ज़ज्बातों का कभी इज़हार मत करना ,
वो जालिम तुम्हे हंस कर गम दें जाएंगे ,
उनसे प्यार पाने का कभी इंतज़ार मत करना,

इश्क की धुप में साए भी जल जाते हैं ,
है गर्मी इसमे इतनी कि पत्थर भी पिघल जाते हैं ,
मेरे दिलो-दिवार से ना उतारो तस्वीर अपनी ,
इन अश्कों कि बारीश में घरौंदें भी बह जाते हैं,

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